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भारतीय साम्यवाद के शिल्पी पी. सी. जोशी
 
(लेखक पी. एन. सिंह, 'समकालीन सोच-41' से साभार)

भारतीय साम्यवादी आन्दोलन के बारे में यह आम मध्यवर्गीय समझ है कि अत्यन्त जनोन्मुख होते हुए भी यह सही अर्थों में भारतीय नहीं बन सका। अर्थात् यह एक नितान्त राजनीतिक आन्दोलन बना रहा, उसमें भी एक ऐसा आन्दोलन जिसमें अपने माक्र्सवाद या माक्र्सवाद-लेनिनवाद को न केवल भारतीय शब्दावली में ढालने से परहेज किया, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी प्रेरणा लेने से इन्कार किया। भारत की सांस्कृतिक जड़ों को इसने दकियानूस और प्रतिक्रियावादी मानकर इनकी कटु आलोचना की या अप्रासंगिक मानकर इनके प्रति उदासीन रहा। महावीर और गौतम की विराट करुणा और सामाजिक चिन्ता, उपनिषदों की बौध्दिकता और मध्ययुगीन वैष्णव चेतना के सामाजिक प्रयासों तथा अपने समकालीन गांधी तक का सही मूल्यांकन करने में यह लगभग असफल रहा। स्वयं पी.सी. जोशी का, जो 1935 से 1947 तक के चुनौतीपूर्ण वर्षों के दौरान राष्ट्रीय महासचिव रहे, और जिन्होंने आन्दोलन को केवल बचाया ही नहीं बल्कि लोकप्रिय भी बनाया हो, पार्टी के भीतर दरकिनार होते जाना और लगभग अनजान मर जाना भी इसके सत्ता सरोकार की केन्द्रीयता का बोधक लगता है। आश्चर्य नहीं, अपनी ईमानदार राष्ट्रीय निष्ठा, त्याग और बलिदान तथा असंदिग्ध जनोन्मुखता के बावजूद यह उस भारतीय मध्यवर्ग की मुख्यधारा से कटा रहा जो राष्ट्रीय चित्तिा का प्रतिनिधि और पुरोहित हुआ करता है।

यूँ तो कलकत्ता में मेरा कम्युनिस्ट आन्दोलन से संस्पर्शीय लगाव सन् 1959-60 से ही था, लेकिन गाजीपुर आने के बाद 1974 में ही मैं पहली बार भारतीय कम्युनिस्ठ पार्टी का सदस्य बना था और पार्टी की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों का निर्वाह करता लगभग 1990 तक सदस्य बना रहा। लेकिन सोवियत संघ के विघटन और फिर मण्डल आयोग के बाद पार्टी मित्रों में पनपे सामाजिक भटकाव ने मुझे पस्तहिम्मत किया, कई रात नींद नहीं आयी और मुझे लगता कि विगत लगभग 30 वर्षों से मैं साम्यवाद के नाम पर एक सपना-मात्र पाले हुए था, हमारी वैज्ञानिक दृष्टि और इतिहास-बोध सम्बन्धी हमारे सारे दावों में कोई आधारभूत कमजोरी थी। फिर भी अभी वैचारिक लगाव कायम है, क्योंकि सोवियत प्रयोग की असफलता के बाद भी ऐसा कोई सामाजिक बोध और इतिहास-दृष्टि सामने नहीं है जो इसका विश्वसनीय विकल्प लगती हो।
मैंने पी.सी. जोशी को कभी देखा नहीं है, वैसे प्रकाशित चित्रों में उनके चेहरे से शालीनता, मासूमियत, ईमानदारी और निष्ठा का भाव टपकता है। कामरेडशिप के दिनों, लगभग हर शाम, हम कई-एक कामरेड, पूर्वांचल के लोकप्रिय कम्युनिस्ट नेता सरजू पाण्डेय के आवास पर इकट्ठे होते और तमाम गम्भीर-हँसोड़ चर्चाओं के दौरान यदा-कदा पी.सी. जोशी की चर्चा भी पाण्डेय जी करते। यह बताते कि कलकत्ताा में 1948 की पार्टी कान्फ्रेंस में कामरेड जोशी अलग-थलग पड़ गये थे। वह स्टेज पर दर किनार एक कोने में उदास बैठे दिखते, उनकी नीतियों क विरुध्द लम्बे-लम्बे उग्र भाषण दिये जाते, और सामने बैठे श्रोता-कामरेडों के बीच से रह-रह कर आवाज उठती-'हैंग, हैंग कामरेड जोशी', अर्थात् 'कामरेड जोशी को फाँसी दो, फाँसी दो।' वह रणदिवेवादी उग्रता का दौर था, और उस समय पी.सी. जोशी द्वारा 15 अगस्त, 1947 को 'राजनीतिक आजादी' का दिन बताया जाना और आर्थिक एवं अन्य स्वतंत्रताओं क लिए स्थापित अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय बुर्जुआ तथा सामन्ती गठजोड़ की सत्ता के साथ दृढ़ 'एकता और संघर्ष' की नीति की वकालत किया जाना उस सत्ता का दलाल होना था। वह दौर वैचारिक उद्वेलन और आन्दोलन प्रयोगों का दौर था। स्थापित सत्ताा के स्वरूप एवं वर्ग चरित्र को लेकर बावेला था। 1948 से 1951 तक रणदिवे की 'मास्को लाइन' चली और 1951-55 तक राजेश्वर राव को 'चाइना लाइन'। इनके बीच जोशी की भारतीय लाइन के लिए कोई जगह नहीं थी। इसलिए अपनी लाइन पर टिके रहने के लिए उन्हें पार्टी से निष्कासित तक किया गया। लेकिन एक-एक करके दोनों लाइनें प्रयोग में ध्वस्त हो गयीं, क्योंकि भारत, रूस अथवा चीन नहीं था। अन्तत: 1955 में अजय घोष, जो भगत सिंह के साथियों में से थे, के महासचिव बनने के बाद पार्टी के भीतर अस्थायी सन्तुलन आया, 1956 में जोशी पुन: पार्टी के सदस्य बना लिए गये, और सोवियत सिध्दान्तकारों के हस्तक्षेप से भारतीय सत्ताा के वर्ग-चित्रण को लेकर गम्भीर पुनर्चिन्तन की आवश्यकता महसूस हुई। इस प्रकार परिस्थितियों ने पी.सी. जोशी को सही ठहराया। लेकिन 1959 में उभरे चीन और भारत के बीच सीमा विवाद और 1962 में चीन-भारत युध्द ने पार्टी के आन्तरिक कलह को फिर से उभार दिया जिसकी चरम सीमा परिणति 1964 में पार्टी के साथ-साथ कम्युनिस्ट आन्दोलन के विभाजन के रूप में हुई। 1948 से 1964 तक के आन्तरिक कलह के दौरान पी.सी. जोशी कभी कोई पहल करते नहीं दिखते। अब मसला डाँगे-राजेश्वर राव-मोहित बनाम रणदिवे-सुन्दरैया-गोपालन के बीच था। 1948 में दरकिनार होने के बाद पी.सी. जोशी कभी कम्युनिस्ट आन्दोलन के रंगमंच पर नहीं दिखे, यद्यपि उन्होंने नींव की मजबूत ईंट का काम किया। शायद आन्दोलनों के पास वैयक्तिक स्मृतियों के लिए कोई जगह नहीं होती। इनके केन्द्र में मुद्दे, विचारधारा और सांगठनिक सरोकार होते हैं, बीती व्यक्तिगत स्मृतियाँ नहीं। इसी माने में आन्दोलन निर्वैयक्तिक और निर्मम हुआ करते हैं।

पी.सी. जोशी सांस्कृतिक और अकादमिक रुचि के भी आदमी थे। पार्टी द्वारा दरकिनार किये जाने पर वह अपने अकादमिक सरोकारों से जुड़ गये। पी.पी.एच. ने 1857 के शताब्दी वर्ष 1957 में जो मेमोरियल वाल्यूम प्रकाशित किया था उसमें पी.सी. जोशी के दो निबन्ध हैं जो उनकी अकादमिक रुचि, विस्तार और गांभीर्य के द्योतक हैं। उसी वर्ष उन्होंने 1857 पर लोकगीतों का एक संग्रह प्रकाशित किया था जिसे मैंने अभी तक पढ़ा नहीं है, लेकिन उनकी भूमिका पर प्रशंसात्मक प्रेक्षण जरूर पढ़ने को मिले हैं। अपने महामन्त्रित्व के दौरान उन्होंने गांधी और नरेन्द्रदेव से पत्राचार किया था जो प्रकाशित है और भारतीय परिप्रेक्ष्य में कम्युनिस्ट आन्दोलन सम्बन्धी उनकी चिन्ताओं पर रोशनी डालता है। बदलते भारतीय सन्दर्भों में वह अपने आन्दोलन का विस्तार चाहते थे और इसके लिए सोवियत और चीनी अनुभवों को महत्वपूर्ण मानते हुए भी भारतीय परिवेश में उन्हें अक्षरश: प्रासंगिक नहीं मानते थे। वह सर्जनात्मक माक्र्सवादी थे। उन्होंने उसी दौर में हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक खतरे को भाँप लिया था और वह नेहरूवादी धर्म निरपेक्षता के समर्थक थे। इस सन्दर्भ में उन्हें समाजवादियों से भी कोई उम्मीद नहीं थी, क्योंकि 1957 में जब लोहिया जवाहर लाल नेहरू के विरुध्द चुनाव लड़ रहे थे तो संघ परिवार ने हिन्दुत्ववादी करपात्री जी का समर्थन न कर लोहिया का समर्थन किया था। हाल वर्षों में इन्हें समाजवादियों से सांठ-गांठ करते जनसंघ भाजपा की राष्ट्रीय क्षितिज पर अन्तत: असरदार उपस्थिति बनी। कहा जा सकता है कि 1948-54 के कम्युनिस्ट संकीर्णवाद का ही परिणाम था कि दौर में समूचा आन्दोलन कांग्रेस-विरोधी दक्षिणपंथी मुहिम का समर्थक बना जिससे हिन्दू साम्प्रदायिकता को बल मिला। पी.सी. जोशी को अन्तत: इतिहास ने सही साबित किया है। एक दौर में जो लोग पी.सी. जोशी को 'दलाल' और हैंग, हैंग' कह रहे थे। आज वह भी अपने साम्प्रदायिकता-विरोधी अभियान में कांग्रेस के साथ हैं। डाँगे और जोशी सही थे, लेकिन डाँगे साहब तरीके अतिरेकी होकर अप्रासंगिक हो गए, और जोशी ने अकादमिक रास्ता पकड़कर अपने को सक्रिय राजनीति की दृष्टि से अप्रासंगिक बना लिया।

अन्तिम दिनों में वह जे.एन.यू. से जुड़ गये थे ओर वहीं पी.सी. जोशी आर्काइव (Click for P. C. Joshi Archives) को समृध्द बनाने में लगे थे। शायद अब स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। 7वें दशक के उत्तारार्ध्द और आठवें दशक में मैं जब कभी भी जे.एन.यू. जाता, जोशी आर्काइव मैं जरूर जाता। उसे मैंने हमेशा खाली और उदास पाया। वहाँ मिलने की हसरत भी कभी पूरी नहीं हुई। अक्सर सूचना मिलती कि तबीयत ठीक नहीं चल रहीं है। अन्तत: 1980 में 9 नवम्बर का उनका इन्तकाल हो गया और शायद ही किसी अखबार में उनके मरने की सूचना प्रकाशित हुई हो। कम्युनिस्ट पार्टियों की प्रतिक्रिया भी दबी-दबी और सूचनात्मक थी। आज आत्ममुग्ध सी.पी.एम. क्या कर रही है नहीं जानता, लेकिन सी.पी.आई. को धन्यवाद देना चाहूँगा जिसने अपने भूले-बिखरे एक दौर के योध्दा को उसके जन्म-शताब्दी वर्ष में राष्ट्रीय स्तर पर याद करने के विवेक का परिचय दिया है। कतिपय प्रबुध्द लोगों से अक्सर सुनता भी हूँ कि सी.पी.एम. अधिक व्यवहारपरस्त और राजनीतिक है, तथा सी.पी.आई. अधिक विचारधारात्मक और सांस्कृतिक।

पूछा जा सकता है कि पी.सी. जोशी का कम्युनिस्ट आन्दोलन को अवदान क्या है ? यही प्रश्न श्रीपाद अमृत डाँगे के बारे में भी उठाया जा सकता है। जो आन्दोलन की पहली पीढ़ी के शीर्षस्थ मनीषियों में थे निकी पुस्तक 'गान्धी एण्ड लेनिन' 1921 में प्रकाशित हुई थी जो लेखक के युवा-उत्साह के बावजूद गांधी ओर उनके आन्दोलन का वस्तुगत आंकलन प्रस्तुत करती है। डाँगे की दूसरी महत्तवपूर्ण पुस्तक भारत : आदिम साम्यवाद से दासप्रथा तक भौतिकवादी इतिहास-लेखन की दृष्टि से एक महत्तवपूर्ण प्रस्थान बिन्दु है जिसमें ऋग्वेद से लेकर महाभारत काल तक भारतीय समाज के विकास और उसकी धार्मिक सांस्कृतिक प्रथाओं एवं प्रतीकों की मौलिक व्याख्या प्रस्तुत की गयी। पी.सी.जोशी ने डाँगे साहब की इस दृष्टि को सांगठनिक विस्तार दिया और इस प्रकार यह आम शिक्षित-अशिक्षित चेतना तक पहुँच सकी। ध्यातव्य है कि सत्यभक्त] गोकुल जी आदि द्वारा कानपुर में 1952 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ और गठन के साथ ही पार्टी प्रतिबन्धित कर दी गयी और जन्म से लेकर 1943 तक यह एक अंडरग्राउन्ड संगठन के रूप में काम करती रही। इसके बहुत सारे सदस्य ट्रेड यूनियनों, किसानों सभाओं, कांग्रेस समाजवादी पार्टी और कांग्रेस तक के मंचों से सक्रिय रहे और इन्हें अन्दर से रैडिकलाइज करने की कोशिश करते रहे। 1935 में पी.सी. जोशी को इसी अण्डरग्राउण्ड पार्टी के महासचिव का दायित्व सौंपा गया था, प्रगतिशील लेखक संघ, इण्डियन पीपुल्स थियेटर (इप्टा), 'सांस्कृतिक दस्तों' जैसे संगठनों के निर्माण में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई और कम्युनिस्ट कार्यकत्तर्ााओं को सांस्कृतिक आयामों के प्रति संवेदनशील बनाया। इस संवेदनशीलता के अभाव में कोई भी आन्दोलन 'राष्ट्रीय' नहीं हो सकता। आदमी के सरोकार केवल रोजी-रोटी और राजनीतिक सत्ताा के सरोकार नहीं होते। इन संगठनों ने बड़े-बड़े विचारकों, रचनाकारों, रंगकर्मियों और फिल्मकारों को आकर्षित किया। जिनसे प्रेमचन्द, रवीन्द्रनाथ, जवाहरलाल नेहरू, ए.के. हंगल, के. ए., अब्बास, सरोजनी नायडू, अमृतलाल नागर, राहुल, यशपाल, मामा बरेरकर, बलराज साहनी, कैफी आजमी, रामविलास, नामवर, भीष्म साहनी आदि प्रत्यक्षत: अथवा परोक्षत: जुड़े रहे। बहुत सारे रंगकर्मी लेखक, रचनाकार, फिल्मी कलाकार और निर्देशक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने, और अपनी प्रतिबन्धित स्थिति में भी पार्टी की सदस्यता 90,000 तक पहुँच गयी थी। ऐसा तब था जब सदस्यता खूब जाँच-परख कर दी जाती थी। लेकिन 1948 में रणदिवेवादियों के 'सर्वहाराकरण' के उन्माद ने पार्टी के मध्यवर्ग से लगभग काट दिया और पार्टी 'मास्को लाइन और 'चाइना लाइन' की शिकार बनी, ओर यह रोग आन्दोलन के किसी न किसी अंग को आज भी दूषित किये हुए है।

विद्यासागर नौटियाल के मानें तो पी.सी. जोशी में अपने छोटे से छोटे साथियों को आत्मीय संस्पर्श देने की अद्भुत क्षमता थी और साथ ही किसी को सच्चे कम्युनिस्ट में रूपान्तरित कर देने की भी-'उन्होंने बहुत कम पढ़े-लिखे मजदूर मजदूर नेता सनत सिंह को मौलाना युसफ में तब्दील कर दिया।' राहुल जी की मानें तो 1930 के पेशावर के वीर नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली को, कांग्रेस द्वारा अपमानित किये जाने बाद, कम्युनिस्ट साहित्य पढ़वा-समझा कर उन्हें न केवल मजदूरों और किसानों को बड़ा नेता बना डाला बल्कि रायल सेना के जवानों तक को प्रभावित किया। 1946 का नाविक विद्रोह के बाद अंग्रेजों को 1857 याद आया होगा और वे समझ गये होंगे कि सैनिक असंतोष एवं विद्रोह दूसरे आघात को वे सह नहीं सकेंगे। इसी समझ के नाते उन्हें भारत को स्वाधीन करने की प्रक्रिया आरम्भ करनी पड़ी और वे कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग नेताओं से बात-चीत करने लगे। 1946 की घटना के बाद वाइसरॉय वैवेल ने अपने कैबुल में भारत में बालशेविक प्रकार की क्रान्तिका अन्देशा व्यक्त किया था और किसी नयी राजनीतिक पहल की सलाह दी थी। 1857, 1921-22, 1930-31, 1942 और 1946 की पीठिका में ही भारतीय स्वाधीनता के समय एवं स्वरूप को समझा जा सकता है और इसी सन्दर्भ में पी.सी. जोशी सांगठनिक क्रान्तिकारी अवदान को भी। यह भूलना कृतघ्नता होगी कि उन्होंने दरकिनार कम्युनिस्ट आन्दोलन को राष्ट्रीय मुख्यधारा में ला खड़ा किया था।

बुध्दिधर्मी कम्युनिस्ट पत्रकार सुब्रत बनर्जी जो आजीवन पी.सी. जोशी के प्रति वफादार बने रहे, लिखते है कि पी.सी. जोशी के प्रति वफादार बने रहे, लिखते हैं कि पी.सी. जोशी अपने कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को अत्यन्त सर्जनात्मक सलाह देते। वह प्रत्येक से कहते कि वह जहाँ कहीं भी हो उसे सर्वोत्ताम बनने का प्रयास करते रहना चाहिए-कार्यालय में सर्वोत्ताम कार्यकत्तर्ाा, शिक्षण संस्था में सर्वोत्ताम छात्र, अगर स्वाधीनता सेनानी है तो सर्वोत्ताम स्वाधीनता सेनानी, इत्यादि। जब तक वह सर्वोत्ताम होने का प्रयास नहीं करता रहता तब तक वह दूसरों के सम्मान और वफादारी का हकदार नहीं हो सकता। वह यह भी कहते रहते कि अपने इतिहास, संस्कृति और सभ्यता का जो प्रगतिशील पहलू है उसको सामने लाना चाहिए, और इसके लिए वर्तमान के साथ-साथ जटिल भारतीय अतीत का भी निष्ठापूर्वक अध्ययन करना चाहिए। वह लोकभाषा और लोक संस्कृति के प्रबल पक्षकार थे और हमेशा कहते है कि कम्युनिस्टों को जनता की भाषा में बात करनी चाहिए। तभी वे उसका विश्वास अर्जित कर उसका प्रबोधन भी कर सकते हैं। उनके पास भारतीय समाज और संस्कृति की बहुलता की स्पष्ट एवं स्वस्थ समझ थी, और वह हर प्रकार की संकीर्ण साम्प्रदायिक दृष्टि के विरोधी थे। वह कहते हैं बहुत महत्तवपूर्ण नहीं, महत्तवपूर्ण यह है कि उन्हें समझाया और शिक्षित किया जाय क्योंकि वे ही क्रान्ति की धुरी हैं। इस रूप में पी.सी. जोशी कम्युनिस्ट सांस्कृतिक नवजागरण के एक अग्रदूत थे, जैसा कि अनिल राजिमवाले मानते हैं।

1939-1945 के महासमर के दौरान वह कम्युनिस्ट पत्रकारों से कहते कि उन्हें फ्रन्ट पर जाकर रिपोर्टिंग करनी चाहिए ताकि वह प्रामाणिक हो सके। वह सामान्य से फौरी मुद्दों एवं संघर्षों को स्वाधीनता संग्राम और साम्यवादी क्रान्ति के बृहत्तार सन्दर्भ में देखते-समझते। सुब्रत बजर्नी के लेखन में एहसास यह भी होता है कि पी.सी. जोशी हर क्षण एक सकारात्मक एवं प्रेरणादायी उपस्थिति होते । पार्टी द्वारा दरकिनार और अवमानित किये जाने के बावजूद वह आजीवन पार्टी और उसके सिध्दान्तों के प्रति जिसे उन्होंने एक खतरनाक दौर से बचाया और सींचा था, वफादार बने रहे, और किसी के प्रति उनके मन में कोई गिला नहीं था। इतने सारे कटु अनुभवों ने उन्हें कभी तिक्त नहीं बनाया। वह सचमुच बड़े थे। उन्होंने अल्मोड़ा की बाहरी सरहद पर एक 'हिमालय सोशलिस्ट आश्रम' बनवाया था जो महात्मा गांधी के आश्रमों की याद दिलाता था। उनके पास कुछ भी व्यक्ति नहीं था। वह एक कम्युनिस्ट तपस्वी थे। समय आया है जब पूरन चन्द्र जोशी को उनके समग्र में देखा जाय। विचारधारात्मक कठमुल्लापन और राजनीतिक महात्तवाकांक्षाओं ने जितनी राख उस देशज कम्युनिस्ट शिल्पी पर फेंकी है उसे हटाया जाय। उनका पुनर्मूल्यांकन, ईमानदार मूल्यांकन ही उनके इस शताब्दी वर्ष में उनके प्रति वास्तविक श्रध्दाजंलि होगी।

 
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