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संस्कृति एक सामाजिक उत्पाद है !

उत्तराखंड मैं लोक गीतों का जब भी जिक्र होगा गिर्दा के बिना वह अधूरा ही रहेगा ! गिरीश तिवारी 'गिर्दा' ने अपनी कविताओं को जनता के स्वर दिए है ! पहाड़ के तमाम जनांदोलन मैं शामिल होकर उन्होंने जन चेतना जगाने का काम किया है ! सत्तर के दशक के वन बचाओ आन्दोलन से लेकर उत्तराखंड आन्दोलन मैं उनकी भूमिका अग्रणीय रही है! ख़राब स्वास्थ्य के बावजूद अभी भी वह तमाम जनसरोकारों से जुड़े हुए हैं ! श्याम देउपा की उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश : साभार : सन्डे पोस्ट

 

प्रशन : आपका लोकगीतों से जुडाव कब हुआ !
 गिर्दा : मेरा जुडाव लोकगीतों से बचपन से ही था ! इसमें चारु चंद्र पाण्डेय जी का विशेष योगदान रहा, उन्होंने मुझे महत्वपूरण जानकारियों से अवगत कराया और बताया की यहाँ तमाम गाथाएं हैं जिनसे कुमांवनी भाषा बोली की   उत्पत्ति हुई ! उत्तराखंड में गुमानी से लेकर गौर्दा तक कई ऐसे कवि हुए है जिन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र से पहले ही खड़ी हिन्दी बोली का प्रयोग किया है! आगे चलकर शमशेर सिंह बिष्ट व शेखर पाठक से मुलाकात हुई ! इस बीच ६६-६७ के समय नक्सलबाड़ी आन्दोलन के दौरान कई मित्रों से पहचान हुई यहाँ से मुझे वैज्ञानिक व सामाजिक दृष्टिकोण मिला ! हमारा मूल उद्देश्य रहा की खाली कविता लिखने से कुछ हासिल नही होने वाला जब तक की कविता को जनचेतना के विकास से नही जोडा जाए ! तभी तो उस समय ऐसी कवितायें लिखी गयी जिनकी गूँज आज तक सुनाई देती है !  
 

प्रशन :लोक संस्कृति को किस तरह परिभाषित करेंगे ?
गिर्दा :  जब मैंने गौर्दा को पड़ा उन्होंने उस समय कहा था  'छिन नि सकनी कभैन सरकार वंदेमातरम' ! उन्होंने उस समय कहा था की संस्कृति क्या होती है , संस्कृति एक सामाजिक उत्पाद है ! सनातन रूप से गतिमान सामाजिक और ऐतिहासिक चक्र से जो पैदा होता है वही संस्कृति है , संस्कृति का मतलब सिर्फ़ मंच पर गाना या कविता लिख देना नही है! घाघरा या पिछोडा पहनने से संस्कृति नही बनती है !  जिन जिन मुकामों से मनुष्य की विकास यात्रा गुजरती रही है उसके अवशेष आज भी हमारी संस्कृति मे मौजूद हैं ! यही तो वह ऐतिहासिक उत्पाद है जिसे इतिहास ने जन्म दिया है ! जब मैंने संस्कृति को इस रूप मे देखा तो छोलिया का अर्थ बदल गया ! पूरे साहित्य का अर्थ बदल गया ! फिर मुझे समझ मे आया की यह तो सामाजिक उत्पाद है ! फिर मुझे कबीर समझ मे आया , तुलसी समझ मे आने लगा ! तब मुझे लगा की यह पूरी संस्कृति तो एक तरह का आन्दोलन है !

प्रशन : आपने कई जनांदोलनों मे भाग लिया है वर्त्तमान और पुराने जनसंघर्षों मे आए बदलाव को आप किस तेरह देखते हैं ?
गिर्दा : पहले कुलिबेगार आन्दोलन  हो या वन बचाओ, जनचेतना की स्पष्ट व सपाट अभिवाक्तियाँ थी ! आदमी से आदमी तक मुहँ से कान तक की गयी सीधी बातचीत दिलों मे ऊठ रहे विद्रोह को स्वर देती थी ! आज वैश्विकरण ने जनान्दोलानो की राह कठिन कर दी है ! धनबल , माफिया व गुंडा तत्वों का प्रभाव बड़ा है ,जिससे सांस्कृतिक  चेतना घटी है ! मीडिया की व्यवसायिकता ने जन आन्दोलनों के प्रभाव को स्थायी होने से रोका है

प्रशन : उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान आपका गीत "ओ जैता एक दिन तो आलो ऊधिन यो दुनी मे........ " आपको क्या लगता है, क्या वो दिन आ गया है ?
गिर्दा : यह गीत तो मनुष्य के मनुष्य होने कि यात्रा का गीत है ! मनुष्य द्वारा जो सुन्दरतम समाज भविष्य मे निर्मित होगा उसकी प्रेरणा का गीत है ! यह उसका खाका भर है , इसमें अभी और रंग भरे जाने है ! अभी तो मनुष्य कि विकासयात्रा घोर  संकट व संक्रमण काल से गुजर रही है ! लेकिन एक दिन यह गीत कल्पना जरूर साकार होगी ! इसका विश्वास है और इस विश्वास कि सटीक अभिव्क्ति वर्त्तमान में चाहिए, बस  

प्रशन : नयी पीड़ी  को क्या संदेश देना चाहेंगे ?
गिर्दा : अच्छा करें, सतत प्रयत्नशील रहे ! आम जनता से जुड़े ,जन पक्षधरता अपनाए अपने कार्यों का स्वयम मूल्यांकन करें ! उत्तराखंडी आकांक्षाओं अपेक्षाओं कि पूर्ति के लिए कमर कसें !   

 

 
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