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जौयां मुरली एक लुप्त होती विरासत
द्वारा चेतना दुर्गपाल (स्रोत:दैनिक जागरण)

murlieजौयां मुरली अलगोजा को कुमाऊंनी भाषा में जौयां मुरली कहा जाता है। जौयां मतलब जुड़वां। इसमें दो सामान्य मुरलियां आपस में जुड़ी होती हैं और इसे बजाना अपेक्षाकृत कठिन होता है, क्योंकि वादन के समय एक स्वर निरंतर बजता रहता है। यह दो नलियों से जोड़कर बनायी जाती है। इसके बनाने का तरीका भी अत्यंत अनोखा है। पानी में भंवर वाली जगह में दो नलियों को छोड़ दिया जाता है। तेज लहरों में 40 से 45 मिनट मथने के बाद ये आपस में जुड़ जाती हैं। फिर इन्हें बाहर निकाल लेते हैं। सात हजार फीट की ऊंचाई पर होने वाले वृक्ष रिंगाल के तने से बनती है ये मुरली। यह मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात और उत्तराखण्ड का वाद्य यंत्र है। इसमें सात सुरों के बजाय सिर्फ पांच सुर होते हैं, इसलिये इसमें गीत नहीं बजते हैं। केवल धुनों का वाद्य है यह और इसमें केवल धुनें निकाली जा सकती हैं। प्रचलित मान्यता यह है कि यह जीव व ब्रह्म के संयोग का रूप है। बांयी ओर का तना प्रकृति का प्रतीक माना जाता है, जिसमें तीन छेद किये जाते हैं जो कि सत, रज, तम के प्रतीक माने गये हैं। दाहिनी ओर का तना पुरुष का प्रतीक है। इसमें पांच छेद होते हैं। ये पंचतत्व के मिश्रण से बनी नश्वर देह के प्रतीक हैं। अत: यह मात्र साधारण सा लोक वाद्य न होकर जीव ब्रह्म के प्रतीक के साथ-साथ प्रकृति एवं पुरुष के संयोग का प्रतीक है। इसकी विशेषता है कि इसमें लोकगीत अथवा अन्य गीतों की धुनें नहीं बजतीं है। इसे केवल पुरुष ही बजा सकते हैं।

पहाड़ में झरने के किनारे किसी पत्थर पर बैठ कभी मुरली की मधुर धुन बजा ग्वाले खुद में खो जाया करते थे। गायें भी उनकी बदलती धुनों का इशारा समझ शाम ढलते खुद घर की राह पकड़ लेती थीं। बदलते दौर के साथ इस विरासत पर भी संकट गहरा गया है। ऐसे में 89 वर्ष का एक अकेला ़फनकार अब भी इस विरासत को संजोये हुए है। उम्र के इस पड़ाव पर भी लाल सिंह रावल की इस कला के प्रति दीवानगी ही है, जो एक सांस में आज भी लोगों को मदमस्त कर देने वाली धुनें सुनाने की क्षमता रखती है। पर गम इस बात का है कि मुरली के इस सरताज का ताज संभालने की युवा पीढ़ी में कोई ललक नहीं दिखती। कैले बजै मुरूली ओ बैना , ऊंची नीची डान्यो मा- यह गाना जौयां मुरली यानि अलगोजा बजाने वाले वादक लाल सिंह रावल के लिये सटीक बैठता है। उम्र बढ़ने के साथ ही व्यक्ति के काम करने की क्षमता धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है। पर जौयां मुरली बजाने वाले इस कलाकार के आगे ये सब बातें मुंह चिढ़ाती-सी लगती हैं। कुमाऊं में इस वाद्य को बजाने वाले वे एक मात्र कलाकार बचे हैं। सफेद कुर्ता-पायजामा, आज भी हाथों में वो पुरानी सी थिरकन और अलगोजा की बात करते ही पुराने दिनों में खो जाते हैं। वह अपने इस स़फर की दास्तां सुनाते हुए कहते हैं कि उनके बड़े भाई कुंवर सिंह रावल (जो अब इस दुनिया में नहीं रहे) इस वाद्य यंत्र के मास्टर थे। भाई, अपने वाद्य को हाथ नहीं लगाने देते थे। पर कहते हैं, जिसके मन में सीखने की ललक हो, वह अपने रास्ते ख़्ाुद ही ढ़ूंढ लेता है। लाल सिंह रावल, भाई के इधर उधर होते ही जौयां मुरली को चुराकर बजाते और इस तरह वह इस वाद्य यंत्र को बजाने में प्रवीण हो गये ।

20 वर्ष की उम्र से अब तक वह अपने ़फन के जादू को बरकरार रखने में सफल रहे हैं। सन् 96 आते-आते तो उनकी मुरली की तान ने लोगों को दीवाना बना दिया।अल्मोड़ा जिले के इस कलाकार ने बताया कि जौयां मुरली से चार अलग-अलग धुनें जंगली, रंगीली, बैरागी और उदासी धुन बजायी जाती हैं। खास बात यह है कि एक ही सांस में ये धुनें बजायी जाती हैं। जब गायें जंगलों में चरने ले जायी जाती हैं तो ग्वाला मस्त हो जो धुन बजाता है, उसे जंगली धुन या स्थानीय भाषा में भैंसिया धुन कहते हैं। शाम ढलते ही इसकी मधुर आवाज सुन कर गायें वापस आ जाती हैं। रंगीली धुन प्रेम में रसिक युवकों द्वारा बजायी जाती है। बैरागी धुन को सुनते ही सामान्य श्रोता के मन में बैराग्य भाव उत्पन्न हो जाते हैं, इसे सर्वप्रथम गोपीचंद नाथ ने बजाया। जिस धुन को सुनते ही श्रोता के मन में उदासी, बैचेनी होने लगे, वह उदासी धुन है। इन धुनों को बजाते समय लाल सिंह इस कदर खो जाते हैं कि झूमते हुए नाचने लगते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे एक ही सांस में बीस मिनट तक इसे बजा लेते हैं। लाल सिंह मसक बीन का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि उस वाद्य को तो पहले फुला लिया जाता है, पर जौयां मुरली को बिना सांस को तोड़े बजाया जाता है। आज इसकी स्थिति पूछने पर वे दुखी हो जाते हैं। और कहते हैं सीखना तो दूर आज इस वाद्य यंत्र का मिलना ही मुश्किल है और यह विलुप्त होने की कगार पर है। जौयां मुरली उनकी आत्मा में इस तरह रचा-बसा है कि वे आज भी रात को उठकर उसे बजाने लगते हैं। मूलरूप से किसान होने के कारण लाल सिंह की माली स्थिति सुदृढ़ नहीं थी। जुगल किशोर पेटशाली को जब पता चला कि वे विलुप्त हो रही जौयां मुरली बजाते हैं तो सन् 93-94 में वे लाल सिंह को अल्मोड़ा आकाशवाणी ले गये। जहां पर दस मिनट की रिकार्डिग के बाद उन्हें 300 रुपये का चेक व प्रमाण पत्र दिया गया। यहां से प्रमाणित हो जाने के बाद लगभग दस कलाकारों के साथ जुगल किशोर पेटशाली उन्हें सन् 96 में लखनऊ आकाशवाणी ले गये। वहां पर स्टूडियो में रिकार्डिग के साथ साथ यूपी सरकार में संस्कृत सचिव अनूप चंद्र पांडे को सभी बातों से अवगत कराते हुए वृद्ध कलाकार पेंशन की पेशकश की। तभी से उन्हें एक हजार रुपये की पेंशन मिल रही है। और यहीं से रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी गयी। इस तरह उन्हें दो हजार रुपये केंद्र सरकार से मिलने लगे।

 

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