टिहरी झील की पहाड़ियों पर भुमाफियाओं की नजरें
देहरादून। लगता है भू-सौदागरों की नजर अब टिहरी झील के इर्द-गिर्द पहाड़ियों पर गढ़ गई है। पिछले एक साल के दौरान इस क्षेत्र में जमीन की खरीद-फरोख्त में बेतहाशा वृद्धि हुई है। वर्ष 05-06 में जहां सिर्फ छह लोगों ने यहां जमीन खरीदी थी और स्टांप ड्यूटी मात्र 32 हजार के आसपास थी, वहीं एक साल बाद 06-07 में 51 रजिस्ट्रियां हुई और स्टांप ड्यूटी करीब 46 लाख रुपये मिली। खास बात यह भी है कि इनमें कई खरीददार राज्य के बाहर के हैं। इतना ही नहीं, खरीद में भू-कानून प्रावधानों का जमकर उल्लंघन किया गया है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने टिहरी झील के चारों ओर हरित पटटी की घोषणा की थी। इसके लिए धन भी दिया जा चुका है। तमाम संभावनाएं नजर आने पर राज्य सरकार ने भी इस क्षेत्र के नियोजित विकास के लिए प्राधिकरण गठन की बात की है। सरकारें केवल घोषणाओं तक सीमित रहीं पर भू-कारोबारियों ने अपनी चाल तेज कर ली है। वर्ष 05-06 में झील के इर्द-गिर्द सिर्फ छह लोगों ने जमीन खरीदी, वहीं एक वर्ष बाद इनकी संख्या 51 हो गई। खास बात यह है कि वर्ष 05-06 के सभी छह खरीददार राज्य के ही निवासी हैं पर इसके अगले साल ग्यारह खरीददार राज्य के बाहर के निवासी हैं। इतना ही नहीं इनमें से सिर्फ एक ने डीएम से इजाजत लेकर भूमि खरीदी है। उस समय वजूद में रहे भू-कानून के अनुसार बिना अनुमति के राज्य के बाहर का निवासी कोई व्यक्ति अधिकतम 500 वर्ग मीटर जमीन खरीद सकता था। इन ग्यारह खरीददारों में से चार ने सीमा से अधिक जमीन खरीदी है। एक व्यक्ति द्वारा कुट्ठा में 3700 वर्ग मीटर भूमि के लिए जिलाधिकारी से इजाजत ली गई। कुट्ठा में ही दिल्ली निवासी तीन खरीददारों ने क्रमश: 600, दूसरे ने 1400 और तीसरे ने 750 वर्ग मीटर जमीन बिना इजाजत के खरीदी है। राज्य के निवासियों द्वारा खरीदी गई जमीन के बारे में चर्चाए हैं कि इसमें बाहरी लोगों का धन लगा है। स्थितियां अनुकूल होते ही स्थानीय निवासियों की आड़ में होटल आदि का निर्माण शुरू कर दिया जाएगा। झील के चारों तरफ होने वाला यह निर्माण एक तरफ तो अनियोजित विकास, तो दूसरी ओर इनसे निकलने वाली गंदगी और गाद टिहरी झील में ही समाएगी। यह टिहरी झील और पूरी गंगा घाटी के पर्यावरण में जहर घोलने के बराबर होगा। टिहरी झील के इर्द-गिर्द सबसे अधिक जमीन कुट्ठा गांव में खरीदी-बेची गई है। इसके अलावा ज्यूॅदासूं, जौलंगी, बौर, भेनगी, मरोड़ा, डाबरी और चोंठी के साथ ही झील के दूसरी ओर प्रतापनगर की तरफ खांड गांव में भी भूमि की खरीद-फरोख्त हुई है।