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"काफल पाको, मैंल नि चाखो"

एक पहाडी थी, जिस पर एक घना जंगल था. उस पहाडी के समीप वाले गाँव में एक औरत अपने बेटे के साथ रहती थी. उनके पास धन की कमी होने के कारण वह जंगल के फल खाकर ही अपना जीवन निर्वाह करते थे.

वह औरत बडा ही कठिन परिश्रम करती थी, लेकिन किसी पर भी यकीन नही करती थी. एक दिन वह जंगल से रसीले काफल के फल तोडकर लाई.  उन काफलों को जंगली पक्षियों से बचाने के लिये अपने बेटे से उन काफलों से भरी टोकरी की देखभाल करने के लिये कहा और खुद खेतों में काम करने चली गयी.  रसीले काफल देखकर बच्चे का मन काफल खाने को ललचाया, लेकिन अपनी माँ के डर से उसने एक भी दाना नही खाया.

वह शंकालु औरत जब शाम को खेतों से थकी हुई घर पहुँची तो काफल धूप से थोडा सूख गये थे, जिससे उनकी मात्रा कम लग रही थी. यह देख कर औरत को गुस्सा आ गया, उसको लगा कि बच्चे ने टोकरी में से कुछ काफल खा लिये हैं. उसने गुस्से में एक बडा पत्थर बेटे की तरफ फेंका जो बच्चे के सिर पर लगा और बच्चा वहीं मर गया.

वो फल बाहर ही पडे रहे, औरत दूसरे दिन फिर जंगल गयी. जब वह वापस आयी तो काफल बारिश में भीग कर फूल गये थे, और टोकरी भरी हुयी दिखने लगी. तब उस औरत को अपनी गलती का अहसास हुआ. अपनी नासमझी के कारण उसने अपना प्यारा सा बेटा मार दिया था.

कहते हैं कि वह बच्चा “घुघुती” पक्षी बन कर अमर हो गया.   इन घुघुती पक्षियों के झुण्ड अब भी गाँव के पास ये आवाज लगाते हुये सुने जाते हैं

"काफल पाको, मैंल नि चाखो"

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी काम बिना सोचे समझे नही करना चाहिये.

संकलन - हेमा पन्त

 
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